डेविड: तीन बेहतरीन कहानियों से बनी एक ढीली फिल्म
Posted On 5th February, 2013 @ 13:37 pm by MTV EDITOR

तीन कहानियों का मेल बताई जा रही डेविड इस शुक्रवार रिलीज़ हुई। बियोज नाम्बियार की इस फिल्म से यूँ तो काफी उम्मीदें लगायी जा रहीं थी, पर पूर्ण रूप से ये उन पर खरी नहीं उतर पाई।

डेविड फिल्म में तीन डेविड नाम के किरदारों की कहानियों को एक सूत्र से बाँधने की कोशिश है। हालाँकि, तीन अलग कहानियाँ जहाँ निर्देशक की काबिलियत को दर्शाती हैं, वहीं आखरी के दस मिनट में उनको एक सूत्र से बाँधने की कोशिश कमज़ोर रही। पर फिल्म की एक जगह दाद देनी होगी, की आजकल की काफी फिल्मों की तरह यहाँ पूर्वनुमेय के कारण नीरसता नहीं है। फिल्म एक सटीक गति से दौड़ती है, और कुछ नयापन भी इस फिल्म को ज़रा हटके बनाता है।

पहली कहानी जिसके 'डेविड' नील नितिन मुकेश हैं, 1975 के लंदन से शुरू होती है। ब्लैक एंड वाइट में फिल्माया गया ये भाग मुस्लिम गैंगस्टर परिवार द्वारा अपनाए गए डेविड की कहानी है। अपने बॉस की तरफ डेविड की वफादारी की असली परीक्षा तब होती है, जब उसे इस बात का पता चलता है की उनका रिश्ता आखिर एक झूट पर आधारित है।

फिल्म के दूसरे डेविड विनय विरमानी हैं, जोकि एक उभरते हुए संगीतकार का किरदार अदा कर रहे हैं। 1999 की इस कहानी में डेविड एक पादरी का बेटा है, और इस निश्चिंत, मस्त डेविड की ज़िन्दगी तब पलटती है, जब हिन्दू रुढ़िवादी संगठन उसके पिता पर हिन्दुओं को ईसाईयों में बदलने के इलज़ाम में हमला करता है।

फिल्म की तीसरी कहानी, 2010 के गोवा में बसे डेविड की है। इस डेविड को अपने सबसे अच्छे दोस्त की मूक-बधिर मंगेतर से प्यार हो जाता है। इस पियक्कड़ डेविड का किरदार विक्रम ने निभाया है।

फिल्म की तीनों काहानियाँ काबिलेतारीफ हैं, बिजोय नाम्बियार ने अपने 'शैतान' के जादू को यहाँ भी बरकरार रखा। उनके निर्देशन की बारीकी और 'स्टाइलिश' तरीके की झलक डेविड में भी मिली। डेविड की कहानी में भी काफी तनावपूर्ण दृश्यों को बेहतरीन ढंग से फिल्माया गया है।

वहीं अभिनय के मामले में विक्रम सबसे आगे रहे, और मसाज पार्लर मालिक के रूप में तब्बू ने भी अपने छोटे से रोल में उनका बखूबी साथ दिया। वहीं पहले वाले डेविड की कहानी में नील नितिन मुकेश और उनकी गर्लफ्रेंड बनी मोनिका डोगरा ने भी अपनी कला का अच्छा प्रदर्शन किया, पर कुछ एक दृश्यों में नील नितिन थोड़े ढीले रहे।

डेविड फिल्म अपने समय की धार्मिक और सांप्रदायिक घटनाओं पर एक सुक्ष्म वार करती है, लेकिन एक अटपटा सा अंत और फिल्म की लम्बाई इसे एक अच्छी फिल्म से एक बेहतरीन फिल्म की दूरी तय करने से रोकती है।

रेटिंग: 3/5

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